सनसनीखेज खबरें और मानसिक स्वास्थ्य: एम्स गोरखपुर के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा

सनसनीखेज खबरें और मानसिक स्वास्थ्य: एम्स गोरखपुर के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा

AIIMS Gorakhpur study reveals shocking findings

AIIMS Gorakhpur study reveals shocking findings

गोरखपुर। Sensational news and mental health: सशस्त्र संघर्ष की सनसनीखेज और अति-राष्ट्रवाद पर आधारित खबरें दर्शकों को अवसाद की ओर ले जा रही हैं। इलेक्ट्रानिक चैनलों पर समाचार रिपोर्टों में अक्सर नाटकीय चित्र और भावनात्मक भाषा का प्रयोग किया जाता है।

यह जानकारी पूर्ण विश्लेषण की बजाय दर्शक की मानसिक स्थिति पर प्रभाव डालता है। यह पुष्टि हुई है एम्स गोरखपुर और महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कालेज इंदौर मध्य प्रदेश के मानसिक रोग विशेषज्ञों के अध्ययन में। यह अध्ययन फ्यूचर हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में नवंबर 2015 में बेरूत और पेरिस में हुए आतंकवादी हमलों का संदर्भ लिया गया है। इसमें एक ट्विटर विश्लेषण से पता चला कि पश्चिमी और अरब मीडिया में सहानुभूति का पूर्वाग्रह था और पीड़ितों को गलत तरीके से पेश किया गया था। इसमें अत्यधिक सहानुभूतिपूर्ण भाषा ने भावनात्मक जुड़ाव को बढ़ा दिया था।

9/11 के शुरुआती हमलों और इराक युद्ध के अध्ययन में, अमेरिका के जिन प्रतिभागियों ने इन घटनाओं का प्रतिदिन चार घंटे से अधिक का टेलीविजन कवरेज देखा, उनमें बाद में पोस्टट्रामेटिक स्ट्रेस के लक्षण और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें अधिक पाई गईं, यहां तक कि उन लोगों में भी जो सीधे तौर पर शामिल नहीं थे।

मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है प्रतिकूल प्रभाव
समाचार माध्यमों द्वारा सशस्त्र संघर्षों की कवरेज जनता को सूचित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है लेकिन जब रिपोर्टिंग सनसनीखेज या भावनात्मक रूप से आवेशित हो जाती है तो इसका मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत-पाकिस्तान संघर्ष या इजरायल-गाजा संघर्ष जैसी तनावपूर्ण घटनाओं के दौरान ऐसी रिपोर्टिंग दर्शकों में तनाव, चिंता, अवसाद और अन्य मनोवैज्ञानिक विकारों को बढ़ाने का कारण बनी।

कश्मीर में 26 पर्यटकों की हत्या भी अध्ययन में शामिल
अध्ययन में 22 अप्रैल, 2025 को कश्मीर में आतंकवादी समूहों द्वारा 26 पर्यटकों की हत्या और इसके बाद जवाबी सैन्य कार्रवाई ने भी दर्शकों का तनाव बढ़ाया। नैतिक और जिम्मेदार पत्रकारिता न केवल सटीक रिपोर्टिंग के लिए बल्कि संकट के समय में जनमानस बनाए रखने और सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक है।

सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान, बिना फिल्टर किए ग्राफिक समाचार छवियों के संपर्क में आने वाले व्यक्तियों में तीव्र तनाव प्रतिक्रियाओं और बढ़े हुए कोर्टिसोल स्तर के लक्षण दिखाई दिए। यह शारीरिक तनाव सक्रियता का संकेत देते हैं। यदि यह संपर्क लंबे समय तक बना रहता है तो ये प्रारंभिक लक्षण अधिक दीर्घकालिक मनोरोग संबंधी विकारों में परिवर्तित हो सकते हैं।

तीव्र तनाव के स्तर की दी जानकारी
इजरायल में वर्ष 2023 के आयरन स्वार्ड्स सैन्य अभियान के दौरान एक सर्वेक्षण में 70 प्रतिशत से अधिक प्रतिभागियों ने तीव्र तनाव के स्तर की सूचना दी। इनमें से कई ने अपनी मीडिया की आदतों को बाध्यकारी और अपरिहार्य माना। इसी तरह, रूस-यूक्रेन संघर्ष से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण भावनात्मक संकट की सूचना दी। इसका मुख्य कारण डिजिटल मीडिया और टेलीविजन में संघर्ष की खबरों के बार-बार संपर्क में आना था।

यह है पीटीएसडी
पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर (पीटीएसडी) एक गंभीर मानसिक स्थिति है जो युद्ध दुर्घटना, यौन शोषण या प्राकृतिक आपदा जैसी भयावह घटनाओं को देखने या झेलने के बाद विकसित होती है। इसके प्रमुख लक्षणों में घटनाओं की यादें/फ्लैश बैक, बुरे सपने, अत्यधिक सतर्कता, चिड़चिड़ापन और याद दिलाने वाली चीजों से बचाव शामिल है। यह कई महीने या सालों तक रह सकता है।


 

जनता पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक बोझ को कम करने के लिए, मीडिया संगठनों को नैतिक दिशा-निर्देशों पर आधारित एक ढांचा अपनाना चाहिए। महत्वपूर्ण प्रथाओं में सत्यापित और निष्पक्ष जानकारी प्रस्तुत करना और परेशान करने वाली सामग्री के लिए चेतावनी जारी करना शामिल है। मीडिया को संघर्ष से प्रभावित समुदायों की आवाज को शामिल करने को प्राथमिकता देनी चाहिए और पत्रकारों को आघात-आधारित और संघर्ष-संवेदनशील रिपोर्टिंग का प्रशिक्षण देना चाहिए।

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-डा. राशिद आलम, मानसिक रोग विभाग